“नहीं साहब मुझे पैसे नहीं चाहिए…. इन पैसों का इस्तेमाल आप अपने लिए किजिए…..”

ये सुनते ही शर्म से मैंने वो पैसे अपने पॉकेट में वापस डाल लिए, जो मै उसे देना चाहता था. उस पल मुझे लगा कि यह कैसा इन्सान है जो पैसे को ठोकर मार रहा है. जहाँ एक तरफ एक-एक सिक्के के लिए लड़ाई है और यह इन्सान अपने हालत में भी खुश है. शायद वह जीने कि कला से अवगत है. जिसे हम बड़े-बड़े ऋषि मुनि के पास जाकर ढूंढते है. लोग कहते है बेरोजगारी बढ गयी है. लेकिन ये इन्सान इस परिस्थिति में भी पैसे कमा रहा है जो कोई हट्टा कट्टा इन्सान कमाने से कतराता है. पैसा कमाना मुश्किल कहा है. आप MBA कर के भी पैसा नहीं कमा रहें हो और ये कुछ न पढ़कर भी कमा रहा है. शर्म करनी चाहिए हमें जब कहते है काम ही नहीं है, ये फुल बेच कर अपनी जीविका संभाल रहा है और अपने साथी को भी इसीने आश्रय दिया है. सोचो वो अकेला है, अनाथ है, अपंग है, लाचार है, बेबस है लेकिन अपने हौसलों से बुलंद है.

वो अपने हालत से अपंग है और हम अपनी सोच से. स्वाभिमान कि बात हर कोई करता है लेकिन उसे कोई अपने जीवन में नहीं उतारता. स्वाभिमान इस इन्सान से सीखो जो कुछ ना होकर भी फूलों को बेचकर अपना पेट भरता है.
उसकी इसी सोच और आत्मविश्वास ने मेरे अन्दर का स्वाभिमान जगा दिया. गर्व है मुझे ऐसे लोगों पर.

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